स्वयं से बातें करते हुए पकड़े जाने से आपको शर्मिन्दगी महसूस हो सकती है, और कुछ लोग तो इस व्यवहार को मानसिक अस्थिरता के संकेत के रूप में निन्दित भी करते हैं। पर दशकों के मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि स्वयं से बातें करना एक पूर्णतः सामान्य बात है। हम में से अधिकतर लोग, किसी न किसी रूप में, हर दिन, स्वयं से बातें करते हैं। तो हम स्वयं से बातें करते क्यों हैं? और क्या जो हम कहते हैं उससे कोई फ़र्क़ भी पड़ता है? सकारात्मक आत्म-चर्चा के मनोवैज्ञानिक लाभों को समझिए। [अवि ओफर द्वारा निर्देशित, एलेक्ज़ेंड्रा पैनज़र द्वारा वर्णित, संगीत सलिल भयानी, cAMP Studio द्वारा।]
