अंतरलैंगिक, अर्थात वे लोग जो स्त्री या पुरुष की प्रचलित परिभाषा से परे होते हैं. ऐसे लोगों पर "सामान्य" होने का दबाव बना रहता है. अपने अनुभवों को बांटते हुए सुसैना बताती हैं कि कैसे उन्हें लज्जा, पक्षपात और मानसिक यातनाओं का सामना करना पड़ता है, कैसे स्त्री अथवा पुरुष की प्रचलित परिभाषा के दायरे में रहना उनकी जीवन में कठिनाइयां एवं दुःख लाता है. वे आव्हान करती हैं कि हमें लिंग की संकीर्ण परिभाषा से ऊपर उठकर, इसकी जटिलता को समझना तथा स्वीकारना चाहिए.

