1998 में, मोनिका लेविन्स्की कहती हैं, "मैं पहली शिकार थी; अपनी सारी प्रतिष्ठा
सारे विश्व में एक क्षण में गँवा देने की इस नयी बीमारी की।" जो बर्ताव उनके साथ ऑनलाइन हुआ, वो आज आम बात हो चुका है, और निरंतर हो रहा है। साहस के साथ वो एक नज़र डालती हैं "शमिंदगी के कल्चर"पर, जिसमें ऑन्लाइन शर्मिदा कर के पैसा कमाया जा रहा है - और वो एक अलग तरह से जीने की माँग रखती हैं
