देखने में एल्नर लाँगडेन किसी भी अन्य छात्रा जैसी थी, आशा से भरपूर और बिंदास। फिर एक समय उसके मस्तिष्क में आवाज़ों ने बोलना आरम्भ किया। शुरू में से आवाज़ें सरल थीं पर शीघ्र ही उग्र होती गईं और उसका जीवन एक दुःस्वप्न बन गया। जाँच में स्कित्ज़ोफ्रेनिया पाया गया, वह हस्पताल में भर्ती हुई, दवाइयाँ चलीं और एल्नर को समाज ने नकार दिया जो नहीं जानता था कि उसकी सहायता कैसे करे। एल्नर अपनी वर्षों लंबी दारुण यात्रा के बारे में बताती हैं जिसमें वे अपना मानसिक संतुलन प्राप्त करती हैं और यह भी बताती हैं कि अपनी आवाज़ों को सुनना सीख कर ही वे इस परिस्थिति से बच कर निकल पाईं।
